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बोडो समझौता: शांति, विकास और नए भविष्य की ओर एक कदम

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बोडो आंदोलन और समझौते की कहानी असम के बोडो समुदाय ने अपने अधिकारों, पहचान और अलग राज्य की मांग को लेकर लंबे समय तक आंदोलन किया। वर्ष 1972 में ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन (ABSU) ने बोडोलैंड राज्य की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया। बाद में इस आंदोलन ने व्यापक रूप ले लिया। अलग बोडोलैंड की मांग को लेकर हुए आंदोलन के दौरान कई बार हिंसा हुई, जिसमें अनेक लोगों की जान गई। इस संघर्ष के कारण क्षेत्र में लंबे समय तक अशांति बनी रही और आम लोगों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। बोडो समझौते से शांति की नई उम्मीद बोडो समुदाय की मांगों का समाधान निकालने के लिए केंद्र सरकार, असम सरकार और बोडो संगठनों के बीच बातचीत हुई। अंततः 27 जनवरी 2020 को बोडो समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में शांति स्थापित करना, बोडो समुदाय की पहचान और संस्कृति की रक्षा करना तथा विकास को बढ़ावा देना था। समझौते के तहत बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (BTC) का नाम बदलकर बोडोलैंड टेरिटोरियल रीजन (BTR) किया गया। इसके साथ ही क्षेत्र के विकास और प्रशासन को बेहतर बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाने का प्रावध...

नेताजी सुभाष चंद्र बोस: भारत की आजादी के महानायक और आजाद हिंद सरकार के संस्थापक

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“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।” यह ओजस्वी नारा देने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारत के स्वतंत्रता संग्राम के उन महान नायकों में से एक थे, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन देश की आजादी के लिए समर्पित कर दिया। उनका साहस, त्याग, राष्ट्रप्रेम और नेतृत्व आज भी करोड़ों भारतीयों को प्रेरित करता है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म और प्रारंभिक जीवन नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को ओडिशा के कटक शहर में हुआ था। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माता का नाम प्रभावती देवी था। उनके पिता एक प्रतिष्ठित वकील थे और चाहते थे कि उनका बेटा पढ़-लिखकर भारतीय सिविल सेवा (ICS) का अधिकारी बने।सुभाष चंद्र बोस बचपन से ही मेधावी, अनुशासित और देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत थे। वर्ष 1920 में उन्होंने भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया। इस उपलब्धि से उनके पिता का सपना पूरा हो गया, लेकिन सुभाष चंद्र बोस के मन में देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने की तीव्र इच्छा थी।   देशसेवा के लिए ICS की नौकरी का त्याग सुभाष चंद्र बोस का मानना था कि जब देश गुलाम हो, तब केवल व्यक्त...

डॉ. विक्रम साराभाई : वह महान वैज्ञानिक जिन्होंने भारत को अंतरिक्ष की राह दिखाई

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“यदि हम अपने देश की समस्याओं का समाधान आधुनिक विज्ञान और तकनीक के माध्यम से करना चाहते हैं, तो हमें अंतरिक्ष विज्ञान को केवल प्रतिष्ठा का विषय नहीं, बल्कि विकास का साधन बनाना होगा।”भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की नींव मजबूत करने वाले महान वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई का जीवन इसी सोच और दूरदृष्टि का प्रतीक है।  डॉ. विक्रम साराभाई कौन थे? डॉ. विक्रम अंबालाल साराभाई का जन्म 12 अगस्त 1919 को अहमदाबाद में एक प्रतिष्ठित उद्योगपति परिवार में हुआ था। उनके पिता अंबालाल साराभाई और माता सरलादेवी साराभाई सामाजिक एवं औद्योगिक क्षेत्र में सक्रिय थे। बचपन से ही विक्रम साराभाई की रुचि विज्ञान, गणित और मशीनों में थी। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्राकृतिक विज्ञान का अध्ययन किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वे भारत लौटे और वैज्ञानिक अनुसंधान की दिशा में अपना महत्वपूर्ण योगदान शुरू किया।   कॉस्मिक किरणों से शुरू हुआ वैज्ञानिक सफर भारत लौटने के बाद साराभाई ने कॉस्मिक किरणों (Cosmic Rays) पर शोध किया। उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्र...

हिंदी: राष्ट्र की अभिव्यक्ति और राजभाषा के रूप में इसकी गौरवशाली यात्रा

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प्रस्तावना-हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता, भावनाओं और एकता को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण भाषा है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदी ने जन-जन तक विचारों और संदेशों को पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज हिंदी भारत की प्रमुख भाषाओं में से एक होने के साथ-साथ देश की राजभाषा के रूप में भी महत्वपूर्ण स्थान रखती है। 14 सितंबर 1949 को हिंदी को मिला महत्वपूर्ण स्थान स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संविधान निर्माताओं ने भारत की भाषाई विविधता को ध्यान में रखते हुए राजभाषा के विषय पर विचार किया। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। इसी ऐतिहासिक अवसर की स्मृति में प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। यह दिन हिंदी के प्रति सम्मान व्यक्त करने और इसके व्यापक प्रयोग को प्रोत्साहित करने का अवसर प्रदान करता है।   राजभाषा हिंदी को बढ़ावा देने के प्रयास सरकारी कामकाज में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने तथा इसकी प्रगति की निगरानी के लिए विभिन्न समितियों और संस्थागत व्यवस्थाओं का गठन किया गया है। इ...

शिवराम हरि राजगुरु : आजादी के क्रांतिदूत, मां भारती के महान सपूत

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आज के युवा जिस 22-23 वर्ष की उम्र में अपने करियर,सपनों और भविष्य के निर्माण में व्यस्त रहते हैं, ठीक उसी उम्र में भारत माता का एक वीर सपूत देश की स्वतंत्रता के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गया। न आंखों में मौत का कोई खौफ, न चेहरे पर जीवन छोड़ने का कोई शिकवा—बस दिल में आजादी की ज्वाला और भारत माता के प्रति अनन्य भक्ति! वे थे महान क्रांतिकारी शिवराम हरि राजगुरु, जिन्होंने शहीद भगत सिंह और सुखदेव के साथ मिलकर देश की आजादी की बलिवेदी पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। प्रारंभिक जीवन और काशी की राह राजगुरु का जन्म 24 अगस्त 1908  को पुणे के खेड़ा गांव में हुआ था। जन्म के बाद लोगों ने भगवान शिव के नाम पर उनका नाम शिवराम हरि राजगुरु रखा। दुर्भाग्यवश, कम उम्र में ही उनके माता-पिता का निधन हो गया, जिसके बाद वे अपने बड़े भाई के घर रहकर पढ़ाई करने लगे। भाई ब्रिटिश सरकार की नौकरी में थे, लेकिन राजगुरु का मन देश की आजादी के आंदोलनों में रम चुका था। वैचारिक मतभेदों के चलते, मात्र 16 वर्ष की आयु में वे घर छोड़कर वाराणसी (काशी) चले आए।जब वे काशी पहुंचे, तो उनके पास सिर्फ: एक जोड़ी कपड़े और ज...

कन्हाई लाल दत्त : 20 वर्ष की आयु में देश के लिए हँसते-हँसते फाँसी चढ़ गए

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भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास ऐसे महान वीरों और क्रांतिकारियों की गाथाओं से भरा पड़ा है, जिन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा और आज़ादी के लिए अपने जीवन का बलिदान देने में एक पल की भी झिझक नहीं दिखाई। ऐसे ही एक महान वीर क्रांतिकारी थे कन्हाई लाल दत्त, जिन्होंने मात्र 20 वर्ष की अल्पायु में देश के लिए फाँसी का फंदा चूम लिया। आइए जानते हैं कन्हाई लाल दत्त के प्रेरणादायी जीवन, उनके शौर्य और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में उनके अतुलनीय योगदान की गाथा।   जन्म और शुरुआती जीवन कन्हाई लाल दत्त का जन्म 15 अगस्त 1888 को हुआ था। संयोग से उस दिन जन्माष्टमी का पावन पर्व था, इसी वजह से उनके माता-पिता ने उनका नाम 'कन्हाई' रखा। साल 1908 में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद कन्हाई कोलकाता चले आए। यहाँ उनका संपर्क प्रसिद्ध 'युगांतर संगठन' के क्रांतिकारियों से हुआ। वे बारिंद्र घोष के घर पर रहने लगे, जो क्रांतिकारियों की गतिविधियों का मुख्य केंद्र था और जहाँ वे अपने हथियार तथा गोला-बारूद सुरक्षित रखते थे। मुजफ्फरपुर बम कांड और अलीपुर जेल मुकदमा 30 अप्रैल 1908 को महान क्रांतिकारी खुदीराम बोस और...

शहीद भगत सिंह: देश की आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाला अमर क्रांतिकारी

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भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास वीरता, त्याग और बलिदान की अनगिनत कहानियों से भरा हुआ है। इन कहानियों में शहीद भगत सिंह का नाम हमेशा स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। वे केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि एक ऐसे युवा विचारक थे, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी देश की आज़ादी और जनता के अधिकारों के लिए समर्पित कर दी। उनका जीवन हमें सिखाता है कि देश के लिए समर्पण केवल हथियार उठाने तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसके पीछे मजबूत विचार, साहस और अपने लक्ष्य के प्रति अटूट विश्वास भी होना चाहिए। बचपन से ही मन में थी आज़ादी की भावना भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को हुआ था। बचपन से ही उनके मन में देश के प्रति गहरा प्रेम था। कहा जाता है कि एक बार वे मिट्टी का ढेर बनाकर उस पर छोटे-छोटे तिनके लगा रहे थे। पिता ने पूछा, क्या कर रहे हो?भगत सिंह ने सहज भाव से उत्तर दिया कि वे बंदूक बो रहे हैं, ताकि बड़े होने पर अंग्रेजों से लड़ सकें।यह घटना बताती है कि उनके मन में देश की गुलामी के प्रति विरोध की भावना कितनी कम उम्र में पैदा हो गई थी। जलियांवाला बाग हत्याकांड ने बदल दी सोच सन् 1919 का जलियांवाला बाग हत्याकांड भा...

विक्रम-1: भारत की कमर्शियल ऑर्बिटल लॉन्च सेवाओं का मजबूत आधार

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भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र तेजी से एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है। अब अंतरिक्ष अभियानों में केवल सरकारी संस्थानों की ही भूमिका नहीं रह गई है, बल्कि भारतीय निजी कंपनियां भी अत्याधुनिक रॉकेट और अंतरिक्ष तकनीक विकसित कर रही हैं। इसी दिशा में विक्रम-1 भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सामने आया है। विक्रम-1 क्या है? विक्रम-1 देश का पहला निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल है। इसे भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस ने विकसित किया है। लगभग 22 मीटर ऊंचे इस रॉकेट को खास तौर पर छोटे उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा यानी लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में स्थापित करने के लिए डिजाइन किया गया है। विक्रम-1 की 350 किलोग्राम तक का पेलोड LEO में पहुंचाने की क्षमता इसे छोटे उपग्रहों के बढ़ते वैश्विक बाजार के लिए महत्वपूर्ण बनाती है। स्वदेशी तकनीक का शानदार प्रदर्शन विक्रम-1 की सबसे बड़ी खासियत इसकी स्वदेशी तकनीकी क्षमताएं हैं। इस लॉन्च व्हीकल में भारत में विकसित कई आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। इसमें कार्बन-कंपोजिट ऑर्बिटल रॉकेट और ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल...

मेजर ध्यानचंद: हॉकी के जादूगर की कहानी, जिनकी स्टिक गेंद से बातें करती थी

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भारतीय हॉकी के इतिहास में मेजर ध्यानचंद का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। उनकी हॉकी की कला ऐसी थी कि लोग उनकी स्टिक को देखकर हैरान रह जाते थे। कहा जाता था कि गेंद उनकी स्टिक से इस तरह चिपकी रहती थी, मानो उसमें कोई चुंबक लगा हो। यही वजह थी कि उन्हें दुनिया भर में “हॉकी का जादूगर” कहा गया।ध्यानचंद की महानता केवल उनके गोल करने की क्षमता में नहीं थी, बल्कि उनकी मेहनत, अनुशासन और खेल के प्रति समर्पण में भी थी। आइए जानते हैं उनके जीवन और शानदार हॉकी सफर की कहानी। साधारण सैनिक से हॉकी के महान खिलाड़ी तक  मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद में हुआ था। उनके पिता सेना में थे। बचपन में उन्हें हॉकी खेलने का कोई विशेष अवसर नहीं मिला और उनके पिता ने उन्हें हॉकी से जुड़ी कोई खास कोचिंग भी नहीं दिलाई। साधारण शिक्षा प्राप्त करने के बाद मात्र 16 वर्ष की उम्र में वर्ष 1922 में दिल्ली में प्रथम ब्राह्मण रेजीमेंट में एक साधारण सिपाही के रूप में भर्ती हो गए। यहीं उनकी मुलाकात सूबेदार मेजर तिवारी से हुई, जिन्होंने उनके अंदर छिपी हॉकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें हॉकी खेलने के लिए प्रेरित क...

हमारा तिरंगा कैसे बना?

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आज हमारा तिरंगा जिस मूल रूप में है, उसके जनक हैं पिंगली वेंकैया। पिंगली वेंकैया का जन्म 2 अगस्त 1876 को आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के पास एक गांव में हुआ था। पिंगली वेंकैया को राष्ट्रीय ध्वज के निर्माण का जिम्मा खुद महात्मा गांधी ने सौंपा था। 1921 में उन्होंने ध्वज तैयार किया। वर्ष 1931 में इसमें कुछ संशोधन किए गए। 22 जुलाई 1947 को भारत का राष्ट्रीय ध्वज मूल रूप में स्वीकार किया गया।

अमूल कोऑपरेटिव की शुरुआत कैसे हुई?

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हेलो दोस्तों, आज मैं आपसे अमूल के बारे मैं बात करने वाला हूँ। तो चलिए बिना किसी देरी के शुरू करते हैं। 1940 के आरंभ में आणंद जिले के किसान अपना दूध आस-पास के गाँवों में बेचते थे। वे चिलचिलाती गरमी में दूध बेचने के लिए नजदीक के गाँव तक साइकिल से या पैदल जाया करते थे। हम सभी जानते हैं कि बहुत गर्म मौसम में दूध जल्दी खराब हो जाता है या फट जाता है। किसानों को दूध खराब होने से पहले जल्द से जल्द बेचना पड़ता था। उन्हें कठिन परिश्रम करने के बाद भी बेहद कम आमदनी होती थी। इसलिए उन्हें बिचौलिए पर निर्भर रहना पड़ता था, जो किसानों से बहुत कम कीमत पर अधिक मात्रा में दूध खरीदते और इसे बाजार में बेच देते थे। कई बार किसान बिचौलियों के कारण ठगा या उत्पीड़ित अनुभव करते थे। एक दिन सभी किसान मिलकर देश के एक बड़े नेता सरदार वल्लभ भाई पटेल के पास अपनी समस्याएँ लेकर मिलने गए। उन्होंने स्वेच्छा से कार्य करने और बिचौलियों पर निर्भरता को रोकने के लिए एक सहकारी संगठन बनाने का परामर्श दिया। एक सहकारी संगठन की तरह किसान एक समूह के रूप में दूध की बिक्री और खरीद कर सकते थे तथा दूध के संग्रह, प्रसंस्करण और वितरण के लि...

विश्व बाल श्रम निषेध दिवस कब मनाया जाता है?

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हेलो दोस्तों, आज मैं आपसे विश्व बाल श्रम निषेध दिवस के बारे मैं बात करने वाला हूँ। तो चलिए बिना किसी देरी के शुरू करते हैं। बाल मजदूरी के विरोध में जागरूकता फैलाने के उद्येश्य से हर साल 12 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जाता है। जिसकी शुरूआत अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन ने 2002 में की थी। यह दिवस न केवल बच्चों के विकास और संवर्धन के लिए आवश्यक उपयुक्त वातावरण पर ध्यान केन्द्रित कराता है बल्कि बाल श्रम के खिलाफ अभियान में भाग लेने वालों को भी अवसर प्रदान कराता है। बाल श्रम (निषेध और विनियमन) संसोधन अधिनियम -  बाल श्रम को रोकने के लिए सरकार ने बाल श्रम (निषेध और विनियमन) संसोधन अधिनियम, 2016 लागू किया है। जो 1 सितंबर 2016 से लागू हो चुका है। अब 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को किसी तरह के व्यवसाय या रोजगार संबंधी कार्यो में लगाना पुरी तरह से गैरकानूनी है। 14 से 18 साल के किशोरों को जोखिम भरे कामों में लगाना पुर्णतः निषेध और गैरकानूनी है। इस नियम का उल्लंघन करने पर कडे दंड के प्रावधान है और अपराध को संज्ञेय बनाया गया है।  केन्द्र सरकार, राज्य सरकार और जिला प्रशासन के माध्यम से ...

विश्व रक्तदान दिवस कब मनाया जाता है?

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हेलो दोस्तों, आज मैं आपसे विश्व रक्तदान दिवस के बारे मैं बात करने वाला हूँ। तो चलिए बिना किसी देरी के शुरू करते हैं।  14 जून को हर साल विश्व रक्तदान दिवस मनाया जाता है। क्योकि 14 जून को नोबल पुरस्कार विजेता कार्ल लैंडस्टीनर का जन्म हुआ था। यही वे साइनटिस्ट थे जिन्होंने ए. बी. और ओ. ब्लड ग्रुप की खोज की थी। इनके जन्मदिन पर ही विश्व रक्तदान दिवस मनाया जाता है। ब्लड ग्रुप का पता लगाये जाने से पहले तक ब्लड ट्रान्सफ्यूजन बिना ग्रुप की जानकारी के होता था। इस खोज के लिए लैंडस्टीनर को 1930 में नोबल पुरस्कार मिला। विश्व रक्तदान दिवस 2026 की थीम है - मानवता की एक बूंद। रक्तदान करें। जिंदगियां बचाएं। रक्तदान को महादान कहते हैं, क्योकि इसे कृत्रिम रूप से बनाया नही जा सकता। रक्त से लाल रक्त कनिकाएँ, प्लेटलेट्स, प्लाजमा और कयोपेसिपिटेट अलग का उपयोग किए जाते हैं। एक यूनिट ब्लड 3 लोगों की जिंदगी बचा सकता है। वयस्क शरिर में लगभग 5 लीटर खून होता है। रक्तदान के लिए लगभग 450 मिली लिटर खून निकाला जाता है। इतना रक्त शरीर 24 से 48 घंटो में फिर से बना लेता है। रक्तदान के फायदे- 1. इससे दिल और लीवर की सेहत...

श्यामजी कृष्ण वर्मा कौन थे?

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"क्रांति दृष्टा"- श्यामजी कृष्ण वर्मा का जन्म 4 अक्टूबर 1857 को गुजरात में कच्छ के मांडवी में हुआ था और वह 1857 की क्रांति की कहानी सुन कर ही बड़े हुए थे। बचपन से ही निडर और स्वार्थ रहित व्यक्तित्व वाले बमाँ केवल 20 साल की उम्र में ही क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे थे। स्कूल की पढ़ाई खत्म करने के बाद वह आगे की पढ़ाई के लिए ऑक्सफोर्ड चले गए थे। वहां लंदन में घर खोजते हुए उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ा। ऐसे में उन्होंने लंदन में भारतीय छात्रों के रहने के लिए मकान खरीदा और उसका नाम 'इंडिया हाउस' रखा। बाद में चल कर यही 'इंडिया हाउस' इंग्लैंड में क्रांतिकारी गतिविधियों का एक प्रमुख केंद बन गया और काफी लोकप्रिय हुआ। कहा जाता है कि इस छात्रावास में गांधी, लेनिन, लाला लाजपत राय, गोपाल कृष्ण गोखले, सावरकर, मदन लाल श्रींगरा सभी आये थे। यहां भारत को आजादी की योजना को लेकर गंभीर बहस होती थी। वह लोकमान्य तिलक और स्वामी दयानंद सरस्वती से प्रेरित थे। उन्होंने भारत की आजादी के लिए ना सिर्फ स्वयं को समर्पित कर दिया बल्कि अनेक राष्ट्रवादियों को प्रेरित किया। माना ...

महान स्वतंत्रता सेनानी - वीर सावरकर

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हेलो दोस्तों, आज मैं आपसे भारतीय स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के बारे में बात करने वाला हूँ।  तो चलिए बिना किसी देरी के शुरू करते है। 28 मई 1883 को महाराष्ट्र में नासिक के निकट भागुर गांव में दामोदर पंत सावरकर के घर विनायक दामोदर सावरकर का जन्म हुआ था। एक क्रांतिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता, चिंतक, लेखक, कवि, वक्ता, राजनेता और दार्शनिक के रूप में उन्हें विनायक दामोदर सावरकर के नाम से जाना गया। मैट्रिक की पढ़ाई पूरी कर पुणे के मशहूर फग्र्युसन कॉलेज से बीए किया। 1904 में उन्होंने 'अभिनव भारत सोसाइटी' नाम की संस्था की स्थापना की। राष्ट्रवाद की भावना से प्रेरित सावरकर ने 1905 में बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी का नारा दिया और पुणे में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई। बाल गंगाधर तिलक के अनुमोदन पर स्कॉलरशिप मिली तो कानून की डिग्री लेने लंदन चले गए। इसी दौरान उन्होंने 'फ्री इंडिया सोसाइटी' की स्थापना की और भारत को स्वतंत्रता दिलाने के प्रयासों में लग गए। लंदन में उस समय 'इंडिया हाउस' राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था। इसे श्याम जी कृष्ण वर्मा चला रहे थे। सावरकर यहीं रहत...

भारतीय सिनेमा के जनक - दादा साहेब फाल्के

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हेलो दोस्तों, आज मैं आपसे भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहेब फाल्के के बारे में बात करने वाला हूँ। तो चलिए बिना किसी देरी के शुरू करते है। दादा साहेब फाल्के का जन्म, महाराष्ट्र में नासिक के निकट त्र्यंबकेश्वर में 30 अप्रैल 1870 को हुआ था। उनका असल नाम धुंडीराज गोविंद फाल्के था। "द लाइफ ऑफ काइस्ट" फिल्म देखने के बाद उन्हें फिल्म बनाने की प्रेरणा मिली। ऐसे में उन्होंने 1912 में फाल्के फिल्म कंपनी की स्थापना की। उन्होंने 3 मई 1913 को बंबई के कोरोनेशन थियेटर में अपनी पहली मूक फिल्म राजा हरिशचन्द्र का प्रदर्शन किया। जिसके बाद से ही देश मे फिचर फिल्मों का चलन बढने लगा। उन्होंने 1917 में महाराष्ट्र के नासिक हिन्दुस्तान फिल्म कंपनी की नीव रखी। अपने करियर के दौरान इन्होंने लगभग 95 फिल्में और 26 लघु फिल्में बनाई। दादा साहेब फाल्के कि प्रसिद्ध फिल्में राजा हरिशचन्द्र, मोहिनी भस्मासुर, सत्यवान सावित्रि, लंका दहन, श्री कृष्ण जन्म, सेतु बंधन और गंगावतरण है। 1932 में बनी फिल्म सेतु बंधन उनकी आखिरी मूक फिल्म थी। जबकि उन्होंने एकमात्र बोलती फिल्म गंगावतरण 1937 का निर्माण किया। 16 फरवरी 1944 को उ...

अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस कब मनाया जाता है?

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हेलो दोस्तो, आज अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस है और इस अवसर पर में आपसे अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस से जुडी जानकारी साझा करूँगा। तो चलिए बिना किसी देरी के शुरू करते हैं। 1993 के यूएन जनरल असेंबली के एक सकल्प के बाद से साल 1994 से हर साल 15 मई को अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस मनाया जाता है। इसका उद्येश्य दुनियाभर को परिवार से जोडे रखना और परिवार से जुडे मुद्दों पर समाज में जागरूकता फैलाना है। अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस, विश्वभर में परिवारों, लोगों, समाजों और सस्कृतियों के महत्व का जश्न मनाने का अवसर है। अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस 2026 की थीम "परिवार, असमानताएँ और बाल कल्याण" है।

प्रीतिलता वाद्देदार कौन थीं?

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हेलो दोस्तों, आज मैं आपसे भारत की स्वतंत्रता के लिए लडने वाली महिलाओं में से एक प्रीतिलता वाद्देदार  के बारे मैं बात करने वाला हूँ। तो चलिए बिना किसी देरी के शुरू करते है। प्रीतिलता  वाद्देदार   का जन्म चटगांव (वर्तमान बांग्लादेश) में 5 मई 1911 को हुआ था। प्रीतिलता  वाद्देदार  भारत की स्वतंत्रता के लिए लडने के लिए हथियार उठाने वाली पहली महिलाओं में से एक थीं। कॉलेज में रहते हुए, वह एक क्रांतिकारी समूह, दीपाली संघ में शामिल हो गईं, जिसने महिलाओं को युद्ध प्रशिक्षण प्रदान किया और उन्हें राजनीतिक रूप से जागरूक किया।कलकत्ता में, वह सूर्य सेन के समूह, भारतीय कांतिकारी सेना (Indian Revolutionary Army) चटगांव शाखा में शामिल हो गई। 1932 में पहाडी यूरोपीय क्लब (यूरोपीय लोगों के लिए एक सामाजिक क्लब) पर इसकी नस्लीय और भेदभावपूर्ण प्रथाओं के लिए हमला करने का निर्णय लिया गया था। प्रीतिलता, हालांकी 21 वर्ष की थीं, उन्हें घेराबंदी करने के लिए प्रशिक्षित 7 से 10 युवाओं के समूह का नेता बनाया गया। 23 सितंबर की रात को, एक आदमी की तरह कपडे पहने, प्रीतिलता ने साहसपूर्वक हमले का...

सीमा सड़क संगठन क्या है? इसकी स्थापना कब हुई?

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हेलो दोस्तों, आज मैं आपसे   सीमा सडक संगठन (Border Roads Organisation)     के बारे मैं बात करने वाला हूं ।  तो चलिए बिना किसी देरी के शुरू करते हैं। सीमा सडक संगठन की स्थापना 7 मई 1960 को भारत की सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए की गई थी। बी.आर.ओ. कठीन पहाडियों और उँचे स्थानों पर भी बेहतरीन सडकें बनाने के लिए जाना जाता है। यह भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत काम करता है। यह संगठन न केवल युद्ध के समय बल्कि शांति के समय भी देश की सेवा करता है। बी.आर.ओ. का आदर्श वाक्य "श्रमेव सर्व साध्यम" है जिसक अर्थ है "मेहनत से सबकुछ हासिल किया जा सकता है।" यह संगठन अन्य पडोसी देशों जैसे अफगानिस्तान, भूटान और म्यांमार में भी बुनियादी ढाँचे का विकास करता है। बी.आर.ओ. की वजह से दुर्गम इलाकों में रहने वाले लोगों और भारतीय सेना को बहुत मदद मिलती है। आपको हमारा यह पोस्ट कैसा लगा कमेंट में जरूर बतायें। आपके कमेंट हमें कुछ नया लिखने और सिखने में मदद करते हैं। धन्यवाद ।

प्रधानमंत्री जीवन ज्योती बीमा योजना

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हेलो दोस्तों, आज मैं आपसे प्रधानमंत्री जीवन ज्योती बीमा योजना के बारे मैं बात करने वाला हूं तो चलिए बिना किसी देरी के शुरू करते हैं। प्रधानमंत्री जीवन ज्याती बीमा योजना की शुरूआत 9 मई 2015 को हुई थी। इस योजना की घोषणा 2015 के केन्द्रिय बजट में की गई थी, जब यह देखा गया कि करीब 20 प्रतिशत आबादी के पास ही किसी तरह का बीमा कवरेज है। इस योजना मे शामिल होने की पात्रता 18 से 50 वर्ष की है। इस योजना का पंजीकरण आप बैंक शाखाओं, इाकघरों और ऑनलाइन कर सकते हैं। योजना का वार्षिक प्रिमियम मात्र 436 रूपये है। इस योजना मे बीमा अवधी के दौरान किसी भी तरह से मृत्यु में 2 लाख रूपये का मुआवजा मिलता है। पात्रता के लिए बैंक या डाकघर मे खाता होना और ऑटो डेबिट की अनुमती अनिवार्य है। इस योजना को शुरू करते समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि आमतौर पर ऐसे बीमा के लिए डॉक्टरी जॉच होती है, कंपनी फैसला करती है किसको दो, किसको नहीं दो। लेकिन इस योजना में आपको सिर्फ फॉर्म भरना है। अगर आप बिमार भी होंगे तो भी आपको बीमा मिल सकता है। आपको हमारा यह पोस्ट कैसा लगा कमेंट में जरूर बतायें। आपके कमेंट हमें कुछ नया ल...