कन्हाई लाल दत्त : 20 वर्ष की आयु में देश के लिए हँसते-हँसते फाँसी चढ़ गए

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास ऐसे महान वीरों और क्रांतिकारियों की गाथाओं से भरा पड़ा है, जिन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा और आज़ादी के लिए अपने जीवन का बलिदान देने में एक पल की भी झिझक नहीं दिखाई। ऐसे ही एक महान वीर क्रांतिकारी थे कन्हाई लाल दत्त, जिन्होंने मात्र 20 वर्ष की अल्पायु में देश के लिए फाँसी का फंदा चूम लिया।

आइए जानते हैं कन्हाई लाल दत्त के प्रेरणादायी जीवन, उनके शौर्य और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में उनके अतुलनीय योगदान की गाथा।

 जन्म और शुरुआती जीवन

कन्हाई लाल दत्त का जन्म 15 अगस्त 1888 को हुआ था। संयोग से उस दिन जन्माष्टमी का पावन पर्व था, इसी वजह से उनके माता-पिता ने उनका नाम 'कन्हाई' रखा। साल 1908 में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद कन्हाई कोलकाता चले आए। यहाँ उनका संपर्क प्रसिद्ध 'युगांतर संगठन' के क्रांतिकारियों से हुआ। वे बारिंद्र घोष के घर पर रहने लगे, जो क्रांतिकारियों की गतिविधियों का मुख्य केंद्र था और जहाँ वे अपने हथियार तथा गोला-बारूद सुरक्षित रखते थे।

मुजफ्फरपुर बम कांड और अलीपुर जेल मुकदमा

30 अप्रैल 1908 को महान क्रांतिकारी खुदीराम बोस और उनके साथी प्रफुल्लचंद चाकी ने मुजफ्फरपुर में अत्याचारी ब्रिटिश जज किंग्सफोर्ड की गाड़ी पर बम फेंका। इस घटना से ब्रिटिश सरकार की नींद उड़ गई और उन्होंने क्रांतिकारियों की धर-पकड़ तेज कर दी। पुलिस को कन्हाई और उनके साथियों की गतिविधियों की भनक लग गई:2 मई 1908 को पुलिस ने कन्हाई के ठिकाने पर छापा मारा, जहाँ से एक बम फैक्ट्री और भारी मात्रा में हथियार बरामद हुए। इसके बाद अंग्रेजों ने अरविन्द घोष, बारिंद्र घोष, सत्येंद्र नाथ (सत्येन) बोस और कन्हाई लाल दत्त समेत 35 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। सभी पर अलीपुर जेल में मुकदमा (Alipore Bomb Case) चलाया गया।

 गद्दार का अंत: मातृभूमि से दगा का करारा जवाब

गिरफ्तार किए गए लोगों में नरेंद्र नाथ गोस्वामी नाम का एक सहयोगी भी था। वह ब्रिटिश सरकार के डर और जेल से छूटने के लालच में आकर सरकारी गवाह (approver) बन गया और अपने साथियों व गुप्त जानकारियों के नाम अंग्रेजों को बताने लगा।गोस्वामी की इस गद्दारी से कई अन्य क्रांतिकारी भी अंग्रेजों के चंगुल में फँस गए। देशद्रोह और दगाबाजी का पाठ सिखाने के लिए कन्हाई लाल दत्त और सत्येन बोस ने ठान लिया कि वे इस गद्दार को जिंदा नहीं छोड़ेंगे। अंग्रेजी सरकार ने नरेंद्र की सुरक्षा बढ़ा दी थी और उसे अलग जेल में रखा था। इसके बावजूद, कन्हाई लाल दत्त ने अपने साथी सत्येन बोस के साथ मिलकर कोर्ट में गवाही होने से पहले ही जेल के अंदर नरेंद्र नाथ गोस्वामी की गोली मारकर हत्या कर दी। इस साहसिक कदम ने पूरे ब्रिटिश प्रशासन को हिलाकर रख दिया।

फाँसी का फंदा और अदम्य साहस

इस घटना के बाद कन्हाई और सत्येन पर हत्या का केस चला: 21 अक्टूबर 1908 को कन्हाई लाल दत्त और सत्येन बोस को फाँसी की सजा सुनाई गई। मुकदमे के दौरान कन्हाई एक पल के लिए भी विचलित नहीं हुए। जब जज ने उनसे इस घटनाक्रम का कारण पूछा, तो उन्होंने गर्व से कहा:"ऐसा करने का सिर्फ एक ही कारण था कि वह हमारे देश का गद्दार था। सजा सुनाए जाने के बाद उन्होंने किसी भी प्रकार की अपील करने से साफ मना कर दिया। 10 नवंबर 1908 को मात्र 20 वर्ष की आयु में कन्हाई लाल दत्त मुस्कुराते हुए फाँसी के फंदे पर झूल गए।

आधुनिक संदर्भ और अमर विरासत

कन्हाई लाल दत्त जैसे वीर बलिदानियों का नाम इतिहास के पन्नों में अमर है। 22 फरवरी 2021 को अपने एक संबोधन में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कन्हाई लाल दत्त का विशेष रूप से ज़िक्र करते हुए कहा था:

चंदननगर सहित यह पूरा क्षेत्र भारत की आजादी, संस्कृति और भारत के ज्ञान-विज्ञान का तीर्थ है। महर्षि अरविंद, रासबिहारी बोस, कन्हाई लाल दत्त, उपेंद्र नारायण बंदोपाध्याय जैसे अनगिनत लोगों का नाता इस धरती से है।

 निष्कर्ष

कन्हाई लाल दत्त का जीवन यह सिखाता है कि देशप्रेम और मातृभूमि के प्रति निष्ठा उम्र की मोहताज नहीं होती। मात्र 20 साल की उम्र में उन्होंने जिस निडरता और वीरता का परिचय दिया, वह आने वाली हर पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी। ऐसे अमर शहीदों को कोटि-कोटि नमन!

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