"क्रांति दृष्टा"- श्यामजी कृष्ण वर्मा का जन्म 4 अक्टूबर 1857 को गुजरात में कच्छ के मांडवी में हुआ था और वह 1857 की क्रांति की कहानी सुन कर ही बड़े हुए थे। बचपन से ही निडर और स्वार्थ रहित व्यक्तित्व वाले बमाँ केवल 20 साल की उम्र में ही क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे थे। स्कूल की पढ़ाई खत्म करने के बाद वह आगे की पढ़ाई के लिए ऑक्सफोर्ड चले गए थे। वहां लंदन में घर खोजते हुए उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ा। ऐसे में उन्होंने लंदन में भारतीय छात्रों के रहने के लिए मकान खरीदा और उसका नाम 'इंडिया हाउस' रखा। बाद में चल कर यही 'इंडिया हाउस' इंग्लैंड में क्रांतिकारी गतिविधियों का एक प्रमुख केंद बन गया और काफी लोकप्रिय हुआ। कहा जाता है कि इस छात्रावास में गांधी, लेनिन, लाला लाजपत राय, गोपाल कृष्ण गोखले, सावरकर, मदन लाल श्रींगरा सभी आये थे। यहां भारत को आजादी की योजना को लेकर गंभीर बहस होती थी। वह लोकमान्य तिलक और स्वामी दयानंद सरस्वती से प्रेरित थे। उन्होंने भारत की आजादी के लिए ना सिर्फ स्वयं को समर्पित कर दिया बल्कि अनेक राष्ट्रवादियों को प्रेरित किया। माना जाता है सावरकर भी इन्हीं से प्रेरणा लेकर क्रांतिकारी बने थे। मदनलाल ढींगरा इनके शिष्य थे। उन्होंने ना केवल देश में बल्कि विदेश में रह रहे भारतीयों के हृदय में भी क्रांति की लौ जलाई। भारत भूमि के वीर सपूत श्यामजी कृष्ण वमां अंग्रेजों की धरती पर रहकर उनकी नाक के नीचे, जीवन की आखिरी सांस तक आजादी के लिए संघर्ष करते
रहे। 31 मार्च 1930 को जिनेवा में श्यामजी कृष्ण वर्मा का निधन हो गया था।
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