अहोम साम्राज्य

 हेलो दोस्तों, कैसे हैं आपलोग? आशा करता हूँ सबकोई स्वस्थ और अच्छे होंगे। दोस्तों, आज मैं आपसे भारत के इतिहास के अहोम साम्राज्य के बारे में बात करने जा रहा हूँ। तो चलिए बिना किसी देरी के शुरू करते हैं

13वी शताब्दी में अहोम जातिय समूह वर्तमान म्यांमार से ब्रह्मपुत्र घाटी मे चले गए एवं वहाँ अहोम साम्राज्य का गठन किया। सल्तनत एवं मुगल काल दोनों समय में अहोम शासको ने उत्तर-पूर्व में विस्तार के प्रयासों का कठोर प्रतिरोध किया। उनकी अनूठी पाइक प्रणाली में प्रत्येक सक्षम व्यक्ति से भूमि अधिकारों के स्थान पर श्रम या सैन्य कर्तव्य के माध्यम से राज्य को सेवा प्रदान करने का आह्वाहन किया जाता था। इससे शासकों को सार्वजनिक आधारभूत संरचना का निर्माण करने एवं स्थायी सेना के बिना विशाल त्वरित बल बनाए रखने का अवसर मिला। समय के साथ अहोमों ने स्थानिय संस्कृति को आत्मसात किया, कृषि को बढावा दिया, विविध धर्मो को प्रोत्साहित किया एवं असम कि समृद्ध परंपराओं में योगदान दिया।


17वी शताब्दी में जब औरंगजेब ने मुगल सेना को अहोम की राजधानी गढगांव पर अधिपत्य के लिए भेजा, तब अहोमों ने घने जंगलों, पहाडियों और नदियों के अपने ज्ञान और लगातार गुरिल्ला निति का प्रयोग हमले को विफल करने के लिए किया। यद्यपि मुगलों के पास अधिक सैनिक और नदी-नौकाओं का एक बडा बेडा था, वर्तमान गुवाहाटी के ब्रह्मपुत्र नदी पर लडे गए सरायघाट के युद्ध 1671 में अहोम सेनापति लचित बरफुकन और उनके 10000 सैनिकों ने 30000 मुगलों की सेना को पराजित किया। अंततः अहोम अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने में सफल रहे।

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