संथाल विद्रोह के नायक - तिलका मांझी

 हेलो दोस्तों, कैसे हैं आपलोग? आशा करता हूँ सबकोई स्वस्थ और अच्छे होंगे। दोस्तों आज मैं संथाल विद्रोह के नायक - तिलका मांझी के बारे में बात करने जा रहा हूँ। तो चलिए बिना किसी देरी के शूरू करते हैं।

दोस्तों, तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी क1750 को बिहार में भागलपुर के सुल्तानगंज में एक संथाल परिवार में हुआ था। मांझी का असल नाम जाबरा पहाडिया बताया जाता है। कहते हैं कि तिलका नाम उन्हें अग्रजों ने दिया था। दरअसल पहाडिया भाषा में तिलका का अर्थ गुस्सैल और लाल-लाल आँखों वाला व्यक्ति होता है। दस्ताजों में यह उनकी पहचान बन गई और इतिहास में तिलका नाम अमर हो गया। ब्रिटिश सता के विरूद्ध लंबा संघर्ष करने वाले तिलका मांझी ने अग्रेजों के सामने कभी भी समर्पण नही किया। न ही कभी झुके और न ही डरे।

1778 में उन्होंने पहाडिया सरदारों के साथ मिलकर रामगढ कैंप को मुक्त करवाया था। 1857 की कांति से पहले 1784 में संथाल में उनके नेतृत्व में 'दामिन सत्याग्रह' लडा गया था। वह ऐसा समय था जब अग्रेज किसी न किसी तरह से अपना विस्तार करते जा रहे थे। मां भारती को धीरे-धीरे जंजीरों के बेडियों में जकडने का प्रयास करते जा रहे थे। इनके नेतृत्व में 1784 में राजमहल के मजिस्ट्रेट क्लीवलैंड को मार दिया गया। इसके बाद अंग्रेज उनके पिछे पड गए और आखिरकार उन्हें गिरफतार कर लिया गया। गिरफतारी के बाद उन्हें घोडे से बॉधकर घसिटते हुए भागलपुर ले गए। 13 जनवरी 1785 को भागलपुर के चौराहे पर एक विशाल वट वृक्ष में लटका कर उन्हें फासी दे दी गई। यही वजह है कि तिलका मांझी को भारत का प्रथम स्वतंत्रता सेनानी भी कहा जाता है। मांझी का असल नाम जाबरा पहाडिया बताया जाता है। कहते हैं कि तिलका नाम उन्हें अग्रजों ने दिया था। दरअसल पहाडिया भाषा में तिलका का अर्थ गुस्सैल और लाल-लाल आँखों वाला व्यक्ति होता है। दस्ताजों में यह उनकी पहचान बन गई और इतिहास में तिलका नाम अमर हो गया। ब्रिटिश सता के विरूद्ध लंबा संघर्ष करने वाले तिलका मांझी ने अग्रेजों के सामने कभी भी समर्पण नही किया। न ही कभी झुके और न ही डरे।


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